शोधन का असाध्य रोगों पर प्रभाव

— डॉ. जगदीप सिहाग

परम श्रद्धेय साथियों,
मैं अक्सर एक बात कहता हूँ कि शरीर केवल भोजन ग्रहण करने से स्वस्थ नहीं होता, बल्कि शरीर में उत्पन्न होने वाले अवांछित पदार्थों का उचित निष्कासन भी उतना ही आवश्यक है। जहाँ पोषण आवश्यक है, वहीं शोधन भी आवश्यक है। यदि निर्माण हो और निकासी न हो, तो किसी भी व्यवस्था में अव्यवस्था उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

मेरे 27 वर्षों के अनुभव में मैंने पाया है कि अनेक रोगों की जड़ शरीर में उत्पन्न अवरोध और अपूर्ण निष्कासन से जुड़ी होती है। जब पाचन तंत्र और उत्सर्जन तंत्र अपनी क्षमता के अनुसार कार्य नहीं कर पाते, तब शरीर में ऐसे अवांछित पदार्थ एकत्रित होने लगते हैं जो विभिन्न अंगों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

यदि शरीर से बाहर निकलने वाले पदार्थ समय पर और उचित मात्रा में बाहर नहीं निकलते, तो वे शरीर के विभिन्न भागों में घूमते हुए अनेक प्रकार की समस्याओं का कारण बन सकते हैं। किसी व्यक्ति में इसका प्रभाव त्वचा पर दिखाई देता है, किसी में श्वसन तंत्र पर, किसी में जोड़ों पर और किसी में अन्य अंगों पर।

शोधन का अर्थ केवल किसी विशेष प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। शोधन का व्यापक अर्थ है—शरीर की प्राकृतिक सफाई व्यवस्था को सक्षम बनाना।

जब पाचन ठीक होगा, उत्सर्जन सुचारु होगा, पसीना उचित आएगा, श्वसन प्रणाली संतुलित होगी और शरीर के निष्कासन तंत्र सक्रिय होंगे, तब शरीर को स्वयं को संतुलित रखने में सहायता मिलेगी।

मैंने देखा है कि जब रोगी के जीवन में श्रम, संयम, उचित भोजन और आवश्यक शोधन को संतुलित रूप से लागू किया जाता है, तब शरीर की कार्यक्षमता में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि शरीर को स्वयं सुधार का अवसर मिलता है।

शोध संदर्भ

मेरा पीएचडी शोध विषय "प्राचीन वाङ्मय में असाध्य रोगों पर श्रम, संयम, भोजन, शोधन एवं सामाजिक परिवेश का प्रभाव" रहा है। अध्ययन और अनुभव दोनों यह संकेत करते हैं कि यदि शरीर की सफाई व्यवस्था बाधित हो जाए, तो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वहीं जब शरीर की प्राकृतिक शोधन प्रक्रिया को सहयोग मिलता है, तो स्वास्थ्य की दिशा में सकारात्मक परिवर्तन संभव होते हैं।

मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि शरीर स्वयं एक अद्भुत प्रयोगशाला है। प्रकृति ने उसे सफाई और संतुलन की क्षमता प्रदान की है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम उसके कार्य में बाधा न बनें और उसे सहयोग दें।

आइए, हम केवल शरीर को भरने की नहीं, बल्कि शरीर को स्वच्छ और संतुलित रखने की भी चिंता करें। क्योंकि स्वस्थ शरीर वही है जिसमें निर्माण और निष्कासन दोनों की प्रक्रिया संतुलित रूप से चल रही हो।

याद रखिए—
"जहाँ उचित शोधन है, वहाँ शरीर को संतुलन का अवसर मिलता है; और जहाँ अवरोध है, वहाँ रोगों के लिए परिस्थितियाँ बन सकती हैं।"